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कोटा के कवि दिव्यांश पोटर “मासूम” की कविताएँ :JIPL

By JIPL On Nov 25, 2020

IPL || दिव्यांश पोटर “मासूम”

1.)
|| लड़कियाँ ||

खल रहा है आज क्यों दहशत में है ये लड़कियाँ।
है वज़ह ये दुष्ट, जो घूँघट में है ये लड़कियाँ।।

राह चलते आँख से कोमल बदन को चीरते।
वो चुभन है महरबां आफ़त में है ये लड़कियाँ।।

जब निकल जाए निकम्मा बाप का वो लाडला।
हर रसम खुद कर रही मरघट में है ये लड़कियाँ।।

“कुछ मरद” नारी को इज्जत बख़्शते हैं आज भी।
बस यही सब सोचकर राहत में है ये लड़कियाँ।।

टांग पेशानी की शिकनें, घर-चमन कर डालती।
सुख-सुकूं को छोड़ बस खटपट में है ये लड़कियाँ।।

कर रहा है वो क़दर उनके स्व’अभिमान की।
इसलिए उस एक की चाहत में है ये लड़कियाँ।।

लानतें हैं, थू है औ’ धिक्कार है उस सोच पर।
जो सिखाये सेज की सलवट में है ये लड़कियाँ।।

-दिव्यांश पोटर “मासूम”

2.)

|| घरों में रुको ||

ये कैसी बदी है घरों में रुको।
वहीं जिंदगी है घरों में रुको।।

निकलकर के दुनिया से मिलना नहीं।
वो ज़ालिम बड़ी है घरों में रुको।।

ज़माना समझ क्यों नहीं पा रहा।
ये मुश्किल घड़ी है घरों में रुको।।

जो निकले थे वो लौट के आये ना।
पहेली यही है घरों में रुको।।

मेरा आज है मौत पे दाखिला।
वो बाहर खड़ी है घरों में रुको।।

डरो, खौफ़ खाओ, रुको जालिमों।
वबा चीख़ती है घरों में रुको।।

मेरी जिंदगी में वो आ ना सके।
हमें क्या पड़ी है घरों में रुको।।

-दिव्यांश पोटर “मासूम”

3.)

|| सब उनके आभारी हैं ||

एक विषाणु ने इतना चकराया है।
विश्व शक्तियों को घुटनों पर लाया है।।

मतलब दम है कम हम से वो कहीं नहीं।
कोई जगह इससे बचने की रही नहीं।।

लेकिन हम भी आर्यों की सन्ताने हैं।
विजय-वरण करने की मन में ठाने हैं।।

इतनी जल्दी हार नहीं स्वीकारेंगे।
इस कोरोना को भी हम ही मारेंगे।।

हमें सिखाया है मृत्यु से भिड़ जाना।
डटकर लड़ना, लड़ते लड़ते मर जाना।।

माना हमने कईं सिकन्दर मारे हैं।
जाने कितने गौरी हमसे हारे हैं।।

लेकिन अबके युद्ध ज़रा अस्पर्श्य है।
और हमारा शत्रु भी अदृश्य है।।

लेकिन पीठ दिखाने वाला जीतेगा।
इस बारी डर जाने वाला जीतेगा।।

जो भी डर के घर में कैद नहीं होगा।
उसमे और मृतक में भेद नहीं होगा।।

इस रण में ना वीरगति मिल पाती है।
सब लाशें उल्टा धिक्कारी जाती है।।

जो भी आगे आएगा, मर जाएगा।
एक मरेगा 10 को लेकर जाएगा।।

तो हे प्रगतिशील भारत! अब थम जाओ।
अभी जहाँ हो तनिक वहीं पर जम जाओ।।

वीर चिकित्सक, महाबली प्रहरी जो हैं।
कोरोना के काल स्वयं वो ही तो हैं।।

घर में रहकर के उनका सम्मान करो।
जो भूखें हैं, उनको थोड़ा दान करो।।

और न भूलो, जान सभी को प्यारी है।
जो जिंदा है, सब उनके आभारी हैं।।

-दिव्यांश पोटर “मासूम”

4.)

|| वो नीला सही का निशान ||

वो निशान,
वो नीला सही का निशान,
बहुत चुभता है
मेरी दोनो आँखों में,
बराबर,
जब भी उसकी और मेरी बातों के पिटारे को खोलता हूँ।
और पाता हूँ…
की मेरे सवालों को
उसने सुना तो बखूबी है,
पर ज़वाब देना
मुनासिब नहीं समझा।

वो नीला सही का निशान,
वो ‘सही’ का होकर भी
अहसास कराता है मुझे
मेरे ‘गलत’ होने का,
जो सुनिश्चित भी नहीं हुआ है
अभी तक।

वो नीला सही का निशान,
छोड़ता है अनेको सवाल
मेरे ज़ेहन में
कि
क्यों किया वो सवाल मैंने,
जबकि मैं जानता था
भलीभाँति
कि नहीं आएगा कोई ज़वाब
उसकी और मेरी बातों के पिटारे के दूसरी और से।

वो नीला सही का निशान,
याद दिलाता है मुझे
बचपन के रसायन के अध्यापक की।
और वो कड़क आवाज़
गूंज जाती है कानों में
एक बार फिर से।
चीख़ रहा होता है वो अध्यापक
कि “ज़हर नीले रंग का होता है”…।

देखता हूँ
उस नीले सही के निशान को
जब भी,
मेरी एक जोड़ी ‘नीली आँखें’
हो जाती है
‘पनीली’ ,
और याद आता है
तभी
कि
“नीला रंग पानी का भी होता है”
पर कहीं ये पाप तो नहीं?
पानी कह देना
आँसुओ को।

वो नीला सही का निशान,
कितना अच्छा लगता,
अगर रहता वो
काला या धूसर ही,
जैसा नीला होने से पहले था।
चिढ़ाती है मुझे
उसकी मौजूदगी,
मेरे उस भेजे गये आख़िरी सन्देश पर,
जबकि वो एक सवाल हो।

वो नीला सही का निशान,
खलता है मुझे उस वक़्त
जब वो नहीं होती
उसकी और मेरी बातों के पिटारे के
दूसरे छोर पर,
तब चीख़ता है
मेरा अंतर्मन,
आख़िर क्यों है
ये नीला सही का निशान।
जब वो है ही नहीं
दूसरे छोर पर
हमारी बातों के पिटारे के।

-दिव्यांश पोटर “मासूम”

5.)

|| पुराना घर ||

दुःख,
उसे भी होता है,
जब आप छोड़ देते हो
नये घर की चाहत में “पुराने घर” को।

जी हां,
वह महसूस करता है,
आपसी दीवारों में दूरियां।
टूटता है अंदर से,
जैसे ‘दरकन’ दीवारों में।

रोती है वो छत।
उसके आंसू देखे जा सकते हैं,
दीवारों में ‘सीलन’ की तरह।

पश्चाताप उसे भी होता है,
आखिर क्यों नहीं बन पाया
“बेहतरीन”
वो आपके लिए।।

ज़वाब-
समझा ही नहीं उसे
इस लायक आपने।

वो “पुराना घर”
हो जाता है वीरान,
आपके जाते ही।

जैसे अकेला हो
पूरी दुनियां में।

नहीं सुन पायेगा
छोटे बच्चे की किलकारी अब।
तभी तो गूँजती है
‘आवाज़’
उस खाली होते घर में।
क्योंकि,
गला भर आया है उसका अब।
और वह गूँज
गूँज नहीं,
आवाज़ भर्रा गयी है उसकी।

रो-रोकर हो जाती है,
भूतहा उसकी शक्ल।
‘भूत-बंगला’ करार दे देते हैं,
गली में खेलते बच्चे।

उसके आंगन में आई गेंद को,
नन्हा जब लेने आता है,
तो
याद में आपके बच्चे की,
वो आंगन का पेड़
करता है हवा
जोर से।

डर जाता है
वो नन्हा,
उसे भूत समझकर।

और वह “पुराना घर”
हो जाता है वीरान
फिर से,

जिसकी इस हालत के जिम्मेदार
और कोई नहीं।
आप हैं,
सिर्फ आप हैं।।

-दिव्यांश पोटर “मासूम”

– Jaipur International Poetry Library (JIPL)

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